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अंधेरे के साये में रहकर जीवन के संघर्षों से लड़ता दिव्यांग टेकराम, पिछले 5 सालोंं से गांव के बच्चों को नि:शुल्क पढ़ा रहे है.

Sukhen sahu churiya.

▶️पिछले पांच सालों से गांव मे निःशुल्क शिक्षा दे रहें हैं.

राजनांदगांव ! DNnews – यह हकीकत की कहानी छुरिया ब्लाक से सटे ग्राम- घोघरे के दिव्यांग युवा टेकराम सलामे की है. टेकराम से पूछने पर बताया कि वह जब पांचवी क्लास में थे तब से धीरे- धीरे दिव्यांग होते गए. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी टेकराम की दिव्यांगता बढ़ता गया. गरीबी के कारण वह अपना इलाज नही करा पाया.और आज वह 80% दिव्यांग हो चुका है. आलम यह है कि न तो टेकराम ढंग से चल सकता है और न ही ढंग से लिख सकता है. भले ही टेकराम शरीर से 80 प्रतिशत दिव्यांग है लेकिन इनके हौसले कम नही हुए हैं. टेकराम दूसरों के सहारे लेखन कार्य कराया और आज वह एम ए. पास कर चुके हैं.जीवन के ऐसे बहुत से कार्य हैं जो टेकराम कर रहे है. टेकराम लगातार पिछले पांच सालों से गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढा रहें हैं। और साथ ही गाँव मे युवाओं के साथ मिलकर स्वच्छता, नारी सशक्तिकरण,कुपोषण,प्लास्टिक मुक्त, वृक्षारोपण और युवा मंडल निर्माण कर विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्य का दायित्व उठाया है.

▶️जीवन के संघर्षों से लड़ता टेकराम

टेकराम एक गरीब परिवार से हैं. और वह बच्चपन से ही कठिन दौर से गुजर रहें हैं। एक तरफ परिवार के ऊपर बोझ और लोगों के ताने,तो दूसरी तरफ घर की गरीबी. ऐसे मुश्किल दौर से गुजरकर टेकराम अपना गुजारा कर रहें हैं और अपने गांव के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रहें हैं। आज के दौर में टेकराम जिस कार्य का बेड़ा उठाये हैं शायद ही ऐसा कार्य कोई करे। कभी -कभी उन्हें कई यातनाएं भी झेलनी पड़ती है. लेकिन इन सभी दर्द को भूलकर कुछ कर गुजरने की चाहत लिए शिक्षा का प्रसार करना है. इतना सब कुछ करने के बाद भी टेकराम की जिंदगी में उजाला नही आया. अंधेरे के साये में रहकर हमेशा प्रकाश देना मकसद रहा है.क्षेत्र में टेकराम हमेशा चर्चा में रहें हैं. इनकी दशा को सब जानते हैं लेकिन आजतक न प्रशासन के कोई अधिकारी मदद के लिए आये, और न ही कोई जनप्रतिनिधि. क्योंकि जीवन की चुनौतियों से टेकराम को स्वयं लड़ता है.

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