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करोना के रोना परे, लोगन मन कहिथे ! किसान मन काम बुता म ,भुखे पियास रहिथे !

मोर ✍ कलम ले……..


ए समय कोरोना के काल चलत हे, सहर अऊ गांव म लोगन मन घरे म खुशरे हे. जादा तर लोगन मन घरे म रहना अपन आप ल सुरछित महसूस करत हे , ए डाहर गरमी घलोक अपन कहर ल परपावत हे। उपर से बादर घलोक उंच निच होवत हे, कभी हवा चलथे त कभी पानी घलोक गिरत हे. कभू कभार तो बड़े बड़े करा घलोक गिरत हे. अभी गरमी के समय घलोक हवय अऊ अइसन समय म गांव म रहईया किसान मन बर बड़ चिंता देखेल ल परत हे। हफ्ता भर पहिली गांव डाहर सर्दी खांसी म माहोल गदफदा गे रिहिस हे. जहां तक मोला जानकारी हे कि गांव डाहर के माहोल धिरे धिरे ठीक होवत हे। कतको बने बने मईनखे मन स्वर्गवासी होगे। अऊ कतको मन कोरोना ले जंग जितके लहुट गे हे। मोला भी बड़ सुरता आथे कि मोर परिवार के सदस्य के अलावा मोर संगवारी मन घलोक मोला छोड़ के चल दिस। ओला करोना ह समहले के मउका घलोक नई दिस। तड़फड़ निपटगे।

▶️ छेना बिनई चलत हे हमर डाहर

बिहनिया छुईखदान डाहर निकले रेहेव उदयपुर खपरी डाहर तो माईलोगन मन घर मे रांधे गड़हे बर छेना लकड़ी के जुगाड़ म लगे हवे। मुड़ म झऊंहा बोहे बहिनी मन एक दुसर ले बने गोठियावत निकलथे. बरसात घलोक अवईया हे ओखर पहिली छत्तीसगढ़िया बहिनी मन छेना लकड़ी के जुगाड़ म लग गेहे, ए डाहर सरकार ह भले गैस सिलेंडर के वयवसथा ल कर देहे फेर मंहगाई के जमाना मे गांव डाहर गेस ल चालू करबे नई करय. कभू-कभू कखरो घर म कोनो सगा सोदर आ जाथे त लकर धकर चाय ल गैस म बना देथे। काबर सगा मन लऊहा म रिथे.

🔴 कांटा खुंटी बिने के अऊ खातू पाले के दिन घलोक आगे

करोना संकट म किसान मन अऊ जादा परेशान हे। मुंदराहा ले किसान मन बैला गाड़ा म खातू पाले के शुरु घलोक कर दे हे। ए डाहर मानसून आए म जादा दिन घलोक नई बचे हे. बरसात लगे के पहिली किसान मन डोली खार ल सजाय म लगे रिथे. कोनो मेड़ पार ल सुधारत रिथे त कोनो खंती माटी कोड़ के डोली मन ल संवारत रिथे।

▶️ लाकडाऊन म बैंक ले करजा नई मिले हे

जब ले लाकडाऊन लगे हे तब ले बैंक मन बंद हे. जेकर सेती किसान मन ल अभी तक बैंक ले करजा नई मिले हे। हाथ म पईसा रिथे त कुछु काम बुता घलोक उसरथे। सुसायटी ले बिजा अऊ खातू घलोक निकाले के हे। सोयाबीन अऊ खातू ल तो किसान मन ल सुसायटी ले निकालेच ल परथे। पर करोना ह तो सबो झन ला रोवावत हे।

🟣 आमा ह लटलट ले फरे हे

एसो तो आमा मन ल झन पुछ . फर मारे डारा मन लदलदा गेहे, हमर छत्तीसगढ़िया मन आमा के आनी बानी के चटनी डारथे, कोनो अथान,चिरवा अऊ का का ल कहिबे। अभी कतको झन म ठेलहा हे त आमा के चटनी डारे तइयारी करत हे। आमा के अथान चटनी के नाम सुनत ही मुंहू म पानी आ जाथे.लार टपके के चालू हो जाथे.बचगे तेन आमा ल सुतई म करोके खोईला घलोक डारथे.

“शब्दार्थ”
घर म खुशरे हे- घर पर ही है
मईनखे – लोग ( आदमी)
मउका – अवसर
छेना- कंडा
बिहनिया – सुबह
माईलोगन – महिला
रांधे गढ़े- खाना बनाना
झंऊहा- बांस से बना हुआ …..
लकर धकर- जल्दी बाजी
ठेलहा – खाली

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3 Comments

  1. बड़ सुग्घर लेख लिखे हो भैया कोरोना और कोरोना में भी गांव के जनजीवन कइसे चलथे ओला आप पूरा वर्णन करे हो।

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