छत्तीसगढ़टेक & ऑटो

बूस्टर डोज लगवाने आई बुजुर्ग महिलाओं को नेशनल लोक अदालत और मध्यस्थता के संबंध में दी गई विधिक जानकारी।

खैरागढ़ ! DNnews- माननीय अध्यक्ष श्री विनय कुमार कश्यप जिला विधिक सेवा प्राधिकरण राजनांदगांव के निर्देशानुसार और माननीय अध्यक्ष श्री चंद्र कुमार कश्यप तालुक विधिक सेवा समिति खैरागढ़ एवं माननीय  सचिव श्री देवाशीष ठाकुर के मार्गदर्शन में आज दिनांक 12.07.2022 को ग्राम आंगनवाड़ी केंद्र कुमही में बूस्टर डोज लगवाने आई  बुजुर्ग महिलाओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं  सहायिकाओं को पैरालीगल वालंटियर गोलूदास द्वारा सर्वप्रथम दिनांक 13.08.2022 को आयोजित होने वाले नेशनल लोक अदालत के संबंध में  कहा गया कि विवादों के त्वरित निवारण के लिए लोक अदालत एक मजबूत मंच है. लोक अदालत जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, लोगों की अदालत जहाँ विवाद के दोनों पक्षकार मिल बैठकर अपनी सहमती व राजीनामे से स्वयं अपने विवाद का समाधान करते है. लोक अदालत कोई नई अवधारणा नही है बल्कि प्राचीन काल से चली आ रही हमारी सामाजिक धारणा का ही भाग है.

पुराने समय में पंचो के माध्यम से विवाद निस्तारण की व्यवस्था थी. ग्राम के प्रतिष्टित व्यक्तियों द्वारा चौपाल में बैठकर आपसी समझाइश से राजीनामा कराया जाता था. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 द्वारा पंच न्याय की इस व्यवस्था को कानूनी रूप देते हुए लोक अदालत का नाम दिया गया.

साथ ही मध्यस्थता के बारे में कहा गया कि मध्यस्थता क्या है? मध्यस्थता विवादों को निपटाने की न्यायिक प्रक्रिया से भिन्न एक वैकल्पिक प्रक्रिया है, जिसमें एक तीसरे स्वतंत्र व्यक्ति मध्यस्थ (मीडियेटर) दो पक्षों के बीच अपने सहयोग से उनके सामान्य हितों के लिए एक समझौते पर सहमत होने के लिए उन्हें तैयार करता है। इस प्रक्रिया में लचीलापन है और कानूनी प्रक्रियागत जटिलताएं नहीं है। इस प्रक्रिया में आपसी मतभेद समाप्त हो जाते है अथवा कम हो जाते हैं।

मध्यस्थता क्यों?

न्यायालय में विवादों को सुलझाने की एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसमें एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने के पश्चात पक्षों का नियंत्रण समाप्त हो जाता है और न्यायालय का नियंत्रण स्थापित हो जाता है। न्यायालय द्वारा एक पक्ष के हित में निर्णय सुनिश्चित है, किन्तु दूसरे पक्ष के विपरीत होना भी उतना ही सुनिश्चित है। दोनों पक्षों के हित में निर्णय, जिससे दोनों पक्ष संतुष्ट हो सकें, ऐसा निर्णय, न्यायालय नहीं दे सकता। न्यायालय द्वारा तथ्यों, विधिक स्थिति तथा न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखकर निर्णय दिया जाता है। जब कि मध्यस्थता दो पक्षों को खुलकर बातचीत करने के लिए प्रेरित और उत्साहित करता है। वह पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में सहयोग प्रदान करता है। वह दोनों पक्षों को अपनी बात कहने का समान अवसर देकर, पक्षों में सामंजस्य स्थापित करता है। मध्यस्थता में विवादों को निपटाने का सारा प्रयास स्वयं पक्षों का होता है, जिसमें मध्यस्थ (मिडियेटर) उनकी सहातया करता है। पूरी प्रक्रिया पर पक्षों का नियंत्रण बना रहता है। निर्णय लेने का अधिकार भी पक्षों का ही रहता है।

Related Articles

Advertisement
Back to top button