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संत श्री राम बालक दास के द्वारा कबीर जयंती पर सत्संग परिचर्चा का आयोजन !

Sanju mahanjan.

जामड़ी पाटेश्वर धाम ! DNnews- कबीर जी की ज्ञान एवं प्रेरणा दायक वाणी से अवगत तो हुए ही साथ ही उनकी जिज्ञासाओं का भी समाधान बाबाजी द्वारा किया गया,
मानसिंह साहू जी ने जिज्ञासा प्रकट करते हुए प्रश्न किया कि “बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ! सूपनखा मृगपूतना, दसमुख प्रमुख विचारि”!इस पर प्रकाश डालने की कृपा हो प्रभु जी, भाव को स्पष्ट करते बाबा जी ने बताया कि रूप से कोई बड़ा. विशाल या महान नहीं होता जैसे शूर्पणखा कितनी सुंदर और रूपबान स्त्री बनकर गई थी परंतु, मन में कपट होने के कारण उसे अपनी नाक कटानि ही पड़ी, मारीच सुंदर सोने का हिरण बन कर गया लेकिन उसके भाव दूषित है और वहां श्री राम जी के द्वारा मोक्ष को प्राप्त हुआ वैसे ही पूतना मां का रूप धारण करके श्री कृष्ण का वध करने गईं मां के जैसा अतुल्य रूप लेने के बाद भी भगवान श्रीकृष्ण ने उस को मोक्ष प्रदान किया रावण जिसके 10 मुख थे लेकिन राम के द्वारा वह भी सदगति को प्राप्त हुआ था अतः चाहे हम बहुत धनी हैं महान हो रूपवान हो जाए वह आवश्यक नहीं है केवल हमारे गुण महान होनी चाहिए इससे हमारी मुक्ति हो सकती है नहीं तो नाश निश्चित है
परिचर्चा में किरण पांडे जी ने प्रश्न किया कि क्या पूजा की तुलसी दल को हम काढे में उपयोग कर सकते हैं, इस विषय को स्पष्ट करते बाबा जी ने बताया कि जब हम तुलसीदल उतारते हैं तो उनसे प्रार्थना करते , छमा मांगते हुए उन्हें उतारना चाहिए एवं तब भगवान को उन्हें चढ़ाना चाहिए और उन्हें काढ़ा आदि प्रयोग करने में कोई दोष नहीं बस यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें यत्र तत्र ना फेके उसे शुद्ध स्थान पर ही डालें या फिर उन्हें ठंडा करे
कबीर दास जी की जयंती पर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी द्वारा रखी गई जिज्ञासा,हिंदू के गुरू मुसलमान के पीर। सात द्वीप नौ खण्ड में सोहम् सत्य कबीर।। कृपया भावार्थ बतायेंगे। बाबा जी ऐसी कौन सी बात या घटना थी जिस पर हिंदू और मुसलमान दोनों कबीरदास जी पर अपना हक जताते थे। इसे स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि संत कबीर ऐसे महान संत है जिन की वाणी, उच्च विचार आज भी सभी को प्रेरित करती हैं महात्मा कबीर को याद करना उनकी वाणी को याद करना उनके सत्यप्रकाश को याद करना एवं अपने मन के भ्रम को दूर कर अनहद नाद की और आगे बढ़ना आज कबीर जयंती का मुख्य उद्देश होना चाहिए
सतगुरु कबीर जी ने मुसलमानों के द्वारा मूर्ति पूजन का विरोध का खंडन किया मुसलमान पक्ष के बहुत बड़े बड़े सूफी संत उनके मित्र थे जिनके साथ बैठकर वे भारतीय धर्म ज्ञान की चर्चा व मुसलमान धर्म के ज्ञान के चर्चा किया करते थे और एक नया इतिहास रचा है ऐसे संत थे जिनके पास हिंदू और मुसलमान दोनों बराबर आया करते थे वे सत्य धर्म को ही शाश्वत बताते थे उनका मानना था कि आज जो धर्म आए हैं चाहे वह मुस्लिम हो या इसाई यह सब नवीनतम धर्म है जबकि हिन्दू धर्म कई करोड़ों साल प्राचीन है कबीर जी ने समाज में फैली हुई छुआछूत की भावनाओं का भरपूर विरोध किया वे छुआछूत को नहीं मानते थे वे उनके साथ बैठा करते थे और भोजन भी किया करते थे कबीर जी का जीवन उनकी वाणी के ही अनुरूप रहा उनका जीवन जितना निर्विवाद था वैसे ही उनका अंतिम समय भी निर्विवाद रहा इसका एक उदाहरण यह रहा कि जब वे मोक्ष को प्राप्त हुए तब उनके दोनों पक्ष के अनुयाई ने उनके शरीर को घेर लिया कोई उन्हें दफनाना चाहता तो कोई उन्हें जलाना, उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में सदैव भी अंधविश्वास का विरोध किया था और उन्होंने मृत्यु में भी इस चीज को सिद्ध किया उन्होंने अपनी मृत्यु के लिए ऐसा स्थान चयन किया जहां कहा जाता था कि वहां पर मृत्यु होने से नर्क को प्राप्त करते हैं जो वह जगह थी बिहार के मगहर , भी इस बात को सिद्ध करना चाहते थे कि किसी जगह है या समय पर आपका मोक्ष निर्भर नहीं करता वह तो केवल और केवल अपने कर्मों पर निर्भर करता है, उन्होंने मगहर में अपने शरीर को त्यागा और जब उनके मृत शरीर से कपड़ा हटाया गया तो वहां पर शरीर के स्थान पर पुष्प प्राप्त हुई जिन्हें आधा एक पक्ष ने और आधा एक पक्ष ने अपने पास रख लिया और मुसलमानों ने उसे दफना दिया और हिंदुओं ने उसे जला दिया इस तरह से दोनों ही पक्षों में सद्भावना बनी रही कबीर दास जी की वाणी पूरे विश्व में गोस्वामी तुलसीदास जी के बाद सर्वाधिक बोली जाती है, बाबा कबीर ने स्वयं कुछ नहीं लिखा वे अपनी मस्ती में ही दोहे साखियां और जीवन के अनुभव को गाया करते थे उनके अनुयायियों द्वारा ही जो कुछ लिखा गया है
बहुत कुछ तो उनकी वाणी नहीं है परंतु लोगों को जो वाणी अच्छी लगी लोगों ने उसे कबीर वाणी के रूप में समाहित कर लिया कहत कबीर सुनो भाई साधु इसमें लग गया वह कबीर वाणी हो गया क्योंकि उनका नाम ही अमर है
रामेश्वर वर्मा जी ने जिज्ञासा की की
मुनि मन मानस हंस निरंतर।चरन कमल बंदित अज संकर।।रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक।काल करम सुभाउ गुन भच्छक।। इस चौपाई पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे गुरु देव।, इन चौपाइयों के भाव के स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि जैसे मानसरोवर से कभी हंस अलग नहीं होते वैसे ही श्रीराम सदैव ही ऋषि-मुनियों के हृदय में वास करते हैं जिनके चरणों को स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश प्रणाम करते हैं | वेद धर्म, नीति मार्ग के रक्षा करने वाले रघुकुल के केतु पताका समस्त काल अकाल कर्म अकर्म के भक्षक ऐसे श्री राम को हम नमन करते हैं
साधकों द्वारा कबीर जयंती पर कबीर जी की वाणी लाली मेरे लाल की, जित देखू तित लाल! लाली देखन मैं गया, मैं भी हो गया लाल! इस पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि यहां पर कबीर जी ने परमात्मा के प्रकाश को लाली के रूप में बताया है वे कहते हैं कि हे ऊपर वाले परमात्मा हे दिव्य शक्तिमान अपनी शक्ति आपका स्त्रोत सारे ब्रह्मांड में विद्यमान हो रहा है मैं तो परमात्मा तत्व को ढूंढने निकला था पर पता ही नहीं चला मैं आप के रंग में कब रंग गया अर्थात भगवान के पीछे चलने वाला भक्त भगवान के रूप गुण लीला में कब सराबोर हो जाता है उसे पता ही नहीं चलता, और वह खुद परमात्मा तत्व बन जाता है
पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने जिज्ञासा रखी की भक्त पीपा दास ने कबीरदास जी को श्रद्धांजलि देते हुये कहा
जो कली मांझ कबीर ना होते।
तो लवेद अरू कलयुग मिल भक्ति रसातल देते।
इसमें क्या वेद की निंदा की गयी है ? कृपया बतायेंगे बाबा जी।, बाबा जी ने बताया कि संत पीपा कबीर दास जी के गुरु भाई थे उन्होंने भी रामानंद जी से ही दीक्षा ग्रहण की थी, यहां पर पंक्तियों में लेखन का दोष होने से यह पंक्तियां वेद की निंदा के समान प्रतीत होती है लेकिन यहां पर इनके भाव कुछ और ही है यहां पर ले वेद नहीं लवेद है, स्पष्ट रूप से समझ सकते हैं कि
वेद पुराण के नाम पर लोग लूट मचा रहे थे और उनकी झूठी मोटी कहानी बनाकर लोगों को ठगा जा रहा था मुसलमानों द्वारा उनका खंडन हो रहा था मंदिर तोड़े जा रहे हैं तब ऐसे समय में संत कबीर जी का जन्म हुआ तब लवेद और कलयुग मिलकर भक्ति को रसातल में लेकर जा रहे थे तो कबीर जी की वाणी यों ने ही भक्ति को उबारा इन पंक्तियों में इस तरह से कबीर जी को श्रद्धांजलि दी गई है
इस प्रकार आज का ऑनलाइन सत्संग संपन्न हुआ
जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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