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केसीजी में देवव्रत सिंह जैसा कोई नेता नहीं और होगा भी...... : 2023 विधानसभा चुनाव मे खैरागढ़ मे फिर से त्रिकोणीय मुकाबला का आसार

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दिनेश साहू प्रधान संपादक 9098981250

खैरागढ़ ! DNnews-खैरागढ़ के दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह के निधन के बाद खैरागढ़-छुईखदान- गंडई जिला निर्माण तो हो चुका है. लेकिन जिला निर्माण के पहले और जिला निर्माण के बाद आज तक कांग्रेस में देवव्रत सिंह जैसा नेता देखने को नहीं मिल रहा है. जिसकी कमी विरोधियों को भी खल रही है. हालांकि बाई इलेक्शन मे कांग्रेस पार्टी के छोटे से छोटे कार्यकर्ता भी टिकट के रेस में आगे रहे. लेकिन जनहित के मुद्दे को लेकर अभी तक कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता सामने नहीं आए हैं.

कांग्रेस-भाजपा में ज्यादातर यह देखने को मिला है कि खुद के मुद्दे छोड़ दूसरे पार्टी के नेताओं का पुतला दहन का दौर तो कहीं ब्यानबाजी जारी है. असल मे राजनीति का यह एक हिस्सा भी है. पालिटिकल स्ट्रंट भी जरूरी है. लेकिन विरोध प्रदर्शन करने का तरीका सही मायनो मे उचित नही दिखता. यह सब स्ट्रंट से फायदा कम नुकसान ज्यादा दिखता है.

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिला डेड़ विधानसभा क्षेत्र का जिला माना जा रहा है. जहां बदहाल शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण व स्वच्छता पर काम करने की आवश्यकता है. लेकिन यहां के नेता राजनीति में सही सीढ़ियां चढ़ने अभी तक सीख नहीं पाए हैं. या यह भी कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को उच्च ओहदे के नेताओं के द्वारा कभी मार्गदर्शन नहीं दिया गया. या कोई बड़ा न बने इसलिए मौका भी नही दिया. खैरागढ़ के दिवंगत विधायक देवव्रत सिंह एक सुलझे हुए राजनीतिज्ञ व्यक्ति थे. जिनके संरक्षण में कई छोटे-छोटे नेता पले बढ़े हैं. देवव्रत सिंह आज भी उनके चाहने वालों ही नही विरोधियों को भी उनकी कमी खलती है.बहरहाल देवव्रत सिंह तो नहीं रहे लेकिन उनकी पद चिन्हों पर चलने वाला नेता भी पैदा नहीं हुए ऐसा राजनीतिक परिदृश्य दिखता है. देवव्रत सिंह जिस रास्ते पर चलकर राजनीति की मुकाम हासिल किए थे. वह राजनीति आज खैरागढ़ में देखने को नहीं मिल रहा है. यहां तो ज्यादातर नेता चाटुकारिता में लगे रहते हैं.

जनता दरबार देवव्रत सिंह की पूंजी रही

देवव्रत सिंह के महल व पैलेस में रोजाना जनता दरबार लगा रहता था जहां जनता अपनी समस्याओं को लेकर उनके घर पर दस्तक देते थे. वही देवव्रत सिंह के घर पहुंचने वाले कोई भी जनता खाली हाथ नहीं लौटते थे. देवव्रत सिंह एक धनवान, बुद्धिमान एवं चाणक्य नीति के जानकार भी थे.यही वजह है कि देवव्रत सिंह अपने चुनाव रणनीति में कारगर साबित हुए. विधानसभा में हुए त्रिकोणीय मुकाबला में देवव्रत सिंह अंतिम तक हार नहीं माने और वह चुनाव जीतकर दिखा भी दिए. देवव्रत सिंह एक ऐसा व्यक्तित्व के धनी थे जिसका व्यवहार वनांचल से लेकर मैदानी इलाकों तक बोलता था

सभी वर्ग के हितैषी रहे
इनके कार्यकाल में सभी वर्ग के लोग खुश थे. देवव्रत सिंह विधायक के साथ-साथ सांसद भी रहे हैं जहां लोकसभा क्षेत्र राजनांदगांव में पूरी पकड़ बना चुके थे. हालांकि कुछ समय तक देवव्रत सिंह अपने आप को राजनीति से अलग-थलग महसूस कर रहे थे लेकिन खुद के बनाए रणनीति से देवव्रत सिंह फिर से चुनाव जीतकर एक बार जनता का सेवक फिर बने. इनके कार्यकाल में अधिकारी कर्मचारियों से लेकर हर वर्ग के जनता खुश नजर आ रहे थे.

क्या देवव्रत सिंह की जगह ले पाएंगे कोई ?
बड़ा सवाल यह है कि देवव्रत सिंह के निधन के बाद खैरागढ के राजनीति मे स्व. देवव्रत सिंह के जगह ले पाएंगे ? खैरागढ़ की राजनीति पूरे छत्तीसगढ़ में हाईप्रोफाइल के रूप मे जाना जाता है. यहां हर समुदाय के लोग निवास करते हैं खैरागढ़ विधानसभा मे पिछले कुछ समय से पिछड़ा वर्ग फैक्टर  जरूर चला. अंततः देवव्रत सिंह फिर से अपने स्थान पर काबिज हो गए देवव्रत सिंह के जगह लेने वाले यहां कोई दमदार नेता दिखाई नहीं पड़ता यह तो वक्त ही बताएगा कि असल में राजनीति किस ओर जा रही है.

इस बार खैरागढ़ विधानसभा मे फिर से त्रिकोणीय मुकाबला का आसार
2023 के अंतिम मे छत्तीसगढ़ मे विधानसभा चुनाव होना है. भाजपा-कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टी के नेताओं का अभी से जनसंपर्क तेज हो गया है. पार्टी मजबूती व खुद की मजबूती के लिए नेता दौरा करना चालू कर दिए है. DNnews ने विधानसभा का दौरा कर जब विधानसभा चुनाव के बारे मे जनता से जानना चाहा तो 2023 मे खैरागढ़ विधानसभा मे फिर से त्रिकोणीय मुकाबला के आसार बता रहे है. यह तो वक्त ही बताएगा....
क्रमश:

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