खैरागढ़। जिले में त्योहार आते ही खाद्य सुरक्षा विभाग की सक्रियता मिठाई की दुकानों, होटल और ढाबों तक पहुंच जाती है। सैंपल लिए जाते हैं, छापेमारी होती है और कार्रवाई की खबरें भी सुर्खियां बनती हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब तक सैंपल की रिपोर्ट प्रयोगशाला से लौटती है, तब तक कथित मिलावटी खाद्य सामग्री कितने लोगों के पेट तक पहुंच चुकी होती है?
सैंपल की रफ्तार धीमी, बाजार की बिक्री तेज!
त्योहारी सीजन में विभाग की कार्रवाई देखकर लगता है कि मिलावटखोरों की मिठाई से पहले विभाग की प्रेस कवायद तैयार हो जाती है। जांच रिपोर्ट आने तक संबंधित खाद्य सामग्री बाजार में बिक चुकी होती है, तो फिर इस कार्रवाई का वास्तविक लाभ उपभोक्ताओं को कितना मिलता है?
सूत्रों के मुताबिक जिले के कुछ दुकानों में कथित नकली मिठाई और एक्सपायरी खाद्य सामग्री बिकने की शिकायतें हैं। यदि ऐसा है, तो विभाग की नजर इन दुकानों तक क्यों नहीं पहुंच रही? शिकायतों की जांच हुई या नहीं, यह भी स्पष्ट होना चाहिए।
होटलों का पानी: प्यास बुझाए या चिंता बढ़ाए?
कई होटल और ढाबों में ग्राहकों को परोसे जाने वाले पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिस पानी को पीने के लिए दिया जाता है, उसकी स्वच्छता सुनिश्चित करना आखिर किसकी जिम्मेदारी है? खाद्य सुरक्षा विभाग की या ग्राहक की, जो बिल चुकाने के बाद बीमारी का जोखिम भी साथ लेकर जाए?
रक्षाबंधन के दौरान इतवारी बाजार में एक दुकान पर कार्रवाई के समय मीडिया की टीम पहुंची थी। आरोप है कि अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने पर जिम्मेदारी उच्च अधिकारियों पर डालने की स्थिति बनी। ऐसी घटनाएं पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती हैं।
अब जरूरत सिर्फ सैंपल लेने की नहीं, नतीजे दिखाने की है।
खाद्य सामग्री की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो, दोषी दुकानों पर नियमानुसार कार्रवाई हो और गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबन या दुकान सील करने जैसे कदम उठें।
आखिर खाद्य सुरक्षा विभाग का काम त्योहारों में छापेमारी की तस्वीरें बनाना है या लोगों की सेहत की सुरक्षा करना? खैरागढ़ की जनता को इसका जवाब कार्रवाई से चाहिए, आश्वासन से नहीं।
नोट: यह खबर प्राप्त शिकायतों और आरोपों पर आधारित है। संबंधित विभाग एवं दुकानदारों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।
अगले अंक में देखिए…
आखिर कहां और कैसे होती है खाद्य सुरक्षा विभाग की लीपापोती?
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