छुईखदान। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक विरासत और लोक परंपराओं में छुईखदान रियासत का दशहरा पर्व अपनी अलग और विशिष्ट पहचान रखता है। देश के अधिकांश हिस्सों में जहां विजयादशमी के अवसर पर रावण के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है, वहीं छुईखदान में करीब 250 वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार मिट्टी से निर्मित रावण का तलवार से शिरोच्छेद कर वध किया जाता है। यह अनूठी परंपरा आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और रियासतकालीन विरासत को जीवंत बनाए हुए है।
रियासतकालीन परंपरा के अनुसार विजयादशमी के अवसर पर राजपरिवार की मौजूदगी में इस ऐतिहासिक आयोजन का निर्वहन किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार छुईखदान रियासत में दशहरा उत्सव की शुरुआत लगभग 1750 से 1780 के बीच हुई थी। तत्कालीन शासक राजा महंत रूप दास जी के शासनकाल में शुरू हुई यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
मिट्टी से बनता है रावण, तलवार से होता है शिरोच्छेद
छुईखदान के दशहरा पर्व की सबसे खास विशेषता इसकी अनूठी परंपरा और निर्माण प्रक्रिया है। स्थानीय कुंभकारों द्वारा पूरी श्रद्धा और पारंपरिक विधि से मिट्टी के रावण का निर्माण किया जाता है। इसके लिए रियासतकाल से निर्धारित ‘नवागांव मार्ग’ की परंपरा भी आज तक कायम है।
विजयादशमी से करीब दो दिन पहले रावण निर्माण का कार्य शुरू किया जाता है। मिट्टी से तैयार किए जाने वाले इस रावण को महज एक पुतला नहीं, बल्कि छुईखदान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। दशहरे के दिन निर्धारित परंपरा के अनुसार तलवार से रावण का शिरोच्छेद किया जाता है।
अमृत कुंड से जुड़ी है रावण वध की मान्यता
छुईखदान की इस अनूठी परंपरा में रावण की नाभि में स्थित अमृत कुंड की मान्यता भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने रावण को जलाने के बजाय उसकी नाभि में स्थित अमृत कुंड को सुखाकर उसका वध किया था। इसी मान्यता से जुड़ी परंपरा के अनुरूप यहां रावण का दहन करने के बजाय तलवार से उसका शिरोच्छेद किया जाता है।
रावण के साथ हनुमान के प्रतीक चिह्न को भी विशेष महत्व दिया जाता है। वैष्णव परंपरा में हनुमान को भक्ति, समर्पण और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि छुईखदान का दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था, लोकविश्वास और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक भी है।
राजपरिवार निभाता है सदियों पुरानी परंपरा
छुईखदान रियासत के इतिहास में दशहरा पर्व का राजपरिवार से गहरा संबंध रहा है। परंपरा के अनुसार विजयादशमी के दिन राजा गिरिराज किशोर दास, अपने अनुज देवराज किशोर दास एवं राजपुरोहित के साथ शाही सवारी में शामिल होते हैं। इस दौरान भजन-कीर्तन और धार्मिक वातावरण के बीच दशहरा उत्सव की परंपराएं आगे बढ़ती हैं।
राजपरिवार के पूर्वजों द्वारा शुरू की गई इस परंपरा को उनके उत्तराधिकारियों ने भी निरंतर आगे बढ़ाया। वर्तमान में राजा गिरिराज किशोर दास द्वारा इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।
आधुनिक दौर में भी कायम है ऐतिहासिक विरासत
आज के आधुनिक दौर में जब कई पारंपरिक आयोजन अपना मूल स्वरूप खोते जा रहे हैं, ऐसे समय में छुईखदान की यह परंपरा इतिहास और संस्कृति को सहेजने का अनूठा उदाहरण है। मिट्टी से रावण का निर्माण, तलवार से उसका शिरोच्छेद और राजपरिवार की सहभागिता—ये सभी पहलू छुईखदान के दशहरा उत्सव को देश के अन्य स्थानों से अलग पहचान देते हैं।
छुईखदान का दशहरा केवल रावण वध का आयोजन नहीं, बल्कि करीब ढाई शताब्दियों से चली आ रही उस सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है, जिसे स्थानीय कुंभकार, राजपरिवार और क्षेत्रवासी आज भी आस्था और परंपरा के साथ संजोए हुए हैं। यही वजह है कि हर वर्ष विजयादशमी के अवसर पर छुईखदान का यह अनोखा दशहरा लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता है।



