छुईखदान। रक्षाबंधन पर भाई का मुंह मीठा कराने के लिए खरीदे गए पेड़े अगले ही दिन ऐसा ‘सरप्राइज’ लेकर सामने आए कि मिठाई खाने की खुशी ही गायब हो गई। एक दिन पहले खरीदी गई खोवे की मिठाई दूसरे दिन डिब्बा खुलते ही फफूंदयुक्त और बदबूदार मिली। परिवार ने मिठाई खाने के बजाय उसे बाहर करना ही बेहतर समझा।
अब सवाल यह है कि मिठाई इतनी जल्दी खराब हुई कैसे? क्या मिठाई की गुणवत्ता में कमी थी, क्या भंडारण सही तरीके से नहीं हुआ या फिर गर्मी और नमी ने अपना असर दिखाया? असली वजह तो जांच और सैंपल की प्रयोगशाला रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगी।
त्योहार आया, मिठाई बिकी... लेकिन जांच कहां गई?
रक्षाबंधन जैसे त्योहारों में मिठाई की बिक्री बढ़ना कोई नई बात नहीं है। बाजार में दुकानों पर मिठाइयों की कतारें लगती हैं और ग्राहक भी भरोसे के साथ खरीदारी करते हैं। ऐसे समय में खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
लेकिन छुईखदान में सामने आए इस मामले को देखकर ऐसा लग रहा है कि मिठाई की दुकानों में मिठास तो भरपूर है, मगर निगरानी का स्वाद कुछ फीका पड़ गया है।
त्योहार से पहले सैंपलिंग, निरीक्षण और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांच की व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है? यदि नियमित जांच हो रही है तो बाजार में ऐसी शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? और यदि जांच नहीं हो रही, तो फिर विभाग की निगरानी व्यवस्था आखिर किसके भरोसे चल रही है?
‘नकली खोवा’ की चर्चा, लेकिन रिपोर्ट का इंतजार
मिठाई खराब मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर खोवे की गुणवत्ता को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि केवल फफूंद लगने या दुर्गंध आने से किसी मिठाई को नकली या मिलावटी घोषित नहीं किया जा सकता।
सच्चाई जानने का सबसे सीधा रास्ता है—सैंपल लीजिए, जांच कराइए और रिपोर्ट सामने रखिए।
यानी मामला अफवाहों से नहीं, फूड लैब की रिपोर्ट से खुलेगा।
सैंपलिंग होगी तो शायद ‘मिठास’ का राज भी खुले!
स्थानीय लोगों की मांग है कि छुईखदान की मिठाई दुकानों का निरीक्षण कर खोवे और तैयार मिठाइयों के नमूने लिए जाएं। साथ ही मिठाई के निर्माण, भंडारण, साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा मानकों की भी जांच की जाए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक डिब्बे में खराब हुए पेड़ों का नहीं है। सवाल यह भी है कि त्योहार के दिनों में उपभोक्ताओं को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री मिल रही है या नहीं।
अब देखना है विभाग ‘जागता’ है या मिठाई के साथ मामला भी बासी हो जाता है!
एक दिन पहले खरीदी गई मिठाई का अगले दिन फफूंदयुक्त और बदबूदार मिलना निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करता है। अब निगाह खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग पर है।
क्या विभाग मौके पर पहुंचकर सैंपल लेगा?
क्या मिठाई की गुणवत्ता की जांच होगी?
क्या भंडारण व्यवस्था की जांच की जाएगी?
और सबसे अहम—क्या रिपोर्ट आने के बाद जिम्मेदारी तय होगी?
क्योंकि उपभोक्ता को सिर्फ त्योहार पर मिठाई नहीं चाहिए, उसे सुरक्षित मिठाई चाहिए।
फिलहाल स्थिति यह है कि रक्षाबंधन की मिठाई में फफूंद तो दिख गई, अब खाद्य विभाग की निगरानी व्यवस्था में कितनी ‘मिठास’ बची है, यह देखना बाकी है।
जांच और प्रयोगशाला रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा कि मिठाई इतनी जल्दी खराब होने की वास्तविक वजह क्या थी।



