Dinesh Sahu Khairagarh .
खैरागढ़,विकासखंड के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता पर ब्लॉक के अधिकारी भले ही अपनी पीठ थपथपा लें, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी सुना रही है। यहां शिक्षा नहीं, व्यवस्था ही “पास” होती नजर आ रही है और बच्चे “फेल”।
ज्यादातर सरकारी स्कूलों में हालात ऐसे हैं कि न बच्चों को शब्द ज्ञान ढंग से आता है, न सामान्य ज्ञान की कोई समझ। सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर “गुणवत्ता” बढ़ाने का दावा जरूर करती है, लेकिन ये गुणवत्ता आखिर जाती कहां है, यह अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है।
स्कूलों में सुविधाओं की बात करें तो “सर्व सुविधा युक्त” स्कूल ढूंढना मानो खजाना खोजने जैसा हो गया है। हर साल शौचालय तो बनते हैं, लेकिन पानी और रखरखाव के अभाव में वे जल्द ही खंडहर में तब्दील हो जाते हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई स्कूलों के शिक्षक “मस्तमौला” अंदाज़ में अपनी ड्यूटी निभाते हैं — जब मन हुआ तो स्कूल पहुंचे, और जब मन किया तो निकल लिए। सुबह की प्रार्थना में उनकी अनुपस्थिति तो जैसे परंपरा बन चुकी है। बच्चों से संवाद तो दूर, कई बार तो शिक्षक खुद ही पढ़ाई से दूर नजर आते हैं।
अब सवाल उठता है कि जब गुरुजी ही लापरवाह हैं, तो बच्चों से क्या उम्मीद की जाए?
इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा कारण ब्लॉक स्तर पर कमजोर नियंत्रण और सुपरविजन माना जा रहा है। अगर समय पर निगरानी होती, तो शायद तस्वीर कुछ और होती।
### 🎯 नवोदय रिजल्ट ने खोल दी पोल
हाल ही में हुई जवाहर नवोदय विद्यालय चयन परीक्षा ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था की असलियत उजागर कर दी है।
राजनांदगांव, खैरागढ़, मानपुर-मोहला और अंबागढ़ चौकी जिलों को मिलाकर 80 सीटों के लिए परीक्षा हुई। इसमें खैरागढ़ जिले से 34 बच्चों का चयन हुआ — जिसमें खैरागढ़ ब्लॉक से 25 और छुईखदान से 9 छात्र-छात्राएं शामिल हैं।
लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है 👇
👉 खैरागढ़ ब्लॉक के 25 चयनित बच्चों में से सिर्फ 6 बच्चे सरकारी स्कूलों से हैं
👉 जबकि 19 बच्चों ने निजी स्कूलों से बाजी मार ली
अब आप खुद ही समझ सकते हैं कि “गुणवत्ता” आखिर कहां पढ़ाई जा रही है।
कम संख्या में होने के बावजूद निजी स्कूलों ने सरकारी सिस्टम को करारा जवाब दे दिया है। जिन स्कूलों से बच्चे चयनित हुए हैं, वहां की पढ़ाई से सरकारी तंत्र को “ट्यूशन” लेने की जरूरत साफ दिखाई देती है।
### ⚠️ निष्कर्ष
सरकारी स्कूलों में सब कुछ है — योजनाएं, बजट, दावे और पोस्टर…
बस अगर कुछ नहीं है, तो वो है परिणाम।
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस “रिजल्ट” को भी अपनी उपलब्धि मानते हैं या फिर हकीकत से सामना करते हैं।


