खैरागढ़। ब्लॉक में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए हैं। DNnews टीम द्वारा किए गए औचक निरीक्षण में अधिकांश स्कूलों में सुबह की प्रार्थना के दौरान कई शिक्षक नदारद मिले। कई स्थानों पर शिक्षक देर से स्कूल पहुंचते और निर्धारित समय से पहले निकलते दिखाई दिए। स्थिति यह है कि जिन स्कूलों के भरोसे शिक्षकों का परिवार चलता है, वहीं उनके प्रति लापरवाही साफ नजर आ रही है।
स्थानीय पालकों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि अधिकांश शिक्षक मुख्यालय में निवास नहीं करते। ब्लॉक स्तर पर बैठे अधिकारी एसी कक्षों में सुपरविजन तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर अनुशासन और समयपालन का अभाव है। उच्च पदों पर बैठे कुछ शिक्षकों में प्रशासन का भय भी नजर नहीं आता, जिससे व्यवस्था और शिथिल हो रही है।
सरकार शिक्षकों को लाखों रुपये वेतन दे रही है, लेकिन कई स्कूलों में पढ़ाई केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित है। बच्चों को सामान्य ज्ञान, व्यवहारिक शिक्षा और प्रतिस्पर्धात्मक तैयारी का अभाव है। परिणामस्वरूप शासकीय स्कूलों की दर्ज संख्या घटती जा रही है और अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। यही वजह है कि कई सरकारी स्कूल में दर्ज संख्या कम होने के वजह से बंद बंद भी करना पड़ा है, निजी स्कूलों में नियमित उपस्थिति, सख्त अनुशासन और परिणामोन्मुखी पढ़ाई के कारण उनका विश्वास बढ़ रहा है। ब्लाक में ऐसे कई स्कुल है जहा बच्चो की दर्ज संख्या ना के बराबर है,
स्थिति केवल खैरागढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों के शिक्षा स्तर में गिरावट की चर्चा आम है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी की ढीली निगरानी के चलते कई स्कूल बंद हो चुके हैं और कई की छात्र संख्या लगातार घट रही है, जिसका सीधा लाभ निजी संस्थानों को मिल रहा है।
हालांकि, यह भी सच है कि कुछ सरकारी शिक्षक पूरी निष्ठा और ईमानदारी से उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि लचर मॉनिटरिंग व्यवस्था को दुरुस्त कर जवाबदेही तय की जाए, ताकि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में पुनः विश्वास बहाल हो सके।


