श्री सीमेंट और चुना पत्थर खनन के विरोध में छुईखदान अंचल में जनआंदोलन चरम पर
खैरागढ़,छुईखदान विकासखंड के दनिया–अतरिया परिक्षेत्र में खनन के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। क्षेत्र के 55 गांवों के किसानों और ग्रामीणों ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला लेते हुए खनन समर्थक नेताओं और अधिकारियों के गांव में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया है। यह निर्णय 20 दिसंबर को आयोजित किसान महापंचायत में सर्वसम्मति से लिया गया, जिसे अब गांव-गांव में लगाए गए बैनरों और पोस्टरों के माध्यम से सार्वजनिक कर दिया गया है।
ग्रामीणों का साफ कहना है कि प्रस्तावित चुना पत्थर खनन और श्री सीमेंट फैक्टरी परियोजना उनके जीवन, खेती, जलस्रोत और पर्यावरण के लिए विनाशकारी है। ऐसे में वे किसी भी कीमत पर इस परियोजना को स्वीकार नहीं करेंगे।
span style="color: rgb(0, 138, 0);">"जमीन, पानी और भविष्य की लड़ाई”ग्रामीणों का मानना है कि खनन शुरू होते ही सबसे पहले कृषि भूमि, भूमिगत जल, नदियां-नाले और जंगल प्रभावित होंगे। इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी की आजीविका पर संकट आएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधकारमय हो जाएगा।
इसी चिंता ने 55 गांवों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां अब संघर्ष केवल विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की निर्णायक लड़ाई बन चुका है।
खनन से प्रभावित 55 गांवों की अभूतपूर्व एकजुटता
इस आंदोलन में संडी, पंडरिया, विचारपुर, भरदागोड़, बुंदेली, हनईबन, जगमड़वा, रैमड़वा, मरतकठेरा, सीताडबरी, मैंहर, जोम, उदान, तेंदुभाठा, माणिकचौरी, नवागांव, सुराडबरी, चारभाठा, दनिया, कोटरा, कुकुरमुड़ा, भुरभूसी, खैरी, गोकना, बागुर, पत्थर्रा, बिरनपुर, धोधा, नवापारा, काशीटोला, कालेगोंदी, मंजगांव, गर्रा, जंगलपुर सहित कुल 55 गांव शामिल हैं।
इन गांवों के किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी गांव अकेला नहीं लड़ेगा, बल्कि पूरा अंचल एकजुट होकर खनन के खिलाफ खड़ा रहेगा।
प्रशासनिक निष्पक्षता संदेह
ग्रामीणों ने जिले के दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि ये अधिकारी निजी कंपनी की प्रेस वार्ता में शामिल होकर कंपनी के पक्ष में बयान दे रहे हैं, जो प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ है। ग्रामीणों के अनुसार यह प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग है और इससे किसानों का प्रशासन पर से भरोसा डगमगा रहा है।
दो महीने का संघर्ष, पहली बड़ी जीत
खनन के खिलाफ यह आंदोलन पिछले दो महीनों से लगातार जारी है। 6 दिसंबर को छुईखदान में आयोजित ट्रैक्टर रैली और विशाल विरोध प्रदर्शन ने प्रशासन को हिला कर रख दिया, जिसके बाद 11 दिसंबर को प्रस्तावित श्री सीमेंट की जनसुनवाई रद्द करनी पड़ी। अब गांव में प्रवेश निषेध का फैसला आंदोलन को और अधिक धार देने वाला कदम माना जा रहा है।
ग्रामीणों की एकमात्र मांग
ग्रामीणों की मांग बिल्कुल स्पष्ट और गैर-समझौता योग्य है—
👉 प्रस्तावित चुना पत्थर खनन और श्री सीमेंट फैक्टरी परियोजना को तत्काल और स्थायी रूप से रद्द किया जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो आंदोलन को और व्यापक व उग्र रूप दिया जाएगा।
- लुकेश्वरी जंघेल, अध्यक्ष
- – किसान अधिकार संघर्ष समिति ने कहा,
- “यह लड़ाई केवल खनन के खिलाफ नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। किसान अपनी जमीन, पानी और आजीविका बचाने के लिए पूरी मजबूती से खड़े हैं।”
- गिरवर जंघेल, संरक्षक
- – किसान अधिकार संघर्ष समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
- “हम अपने गांवों की मिट्टी और पानी की रक्षा कर रहे हैं। हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे, इसलिए खनन का विरोध कर रहे हैं। यह संघर्ष अब पीछे नहीं हटेगा।”
सामाजिक संगठनों का मजबूत साथ
इस जनआंदोलन को जिला साहू समाज, जिला लोधी समाज, जिला कोसरिया यादव महासभा, 24 जाति ओबीसी महासंघ (खैरागढ़–छुईखदान–गंडई) सहित कई सामाजिक संगठनों का खुला समर्थन मिल रहा है।
इस सामाजिक एकजुटता ने दनिया–अतरिया–उदयपुर–हनईबन परिक्षेत्र के किसानों में नया आत्मविश्वास भर दिया है।
अब नजर प्रशासन के फैसले पर
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जिला प्रशासन 55 गांवों की एकजुट आवाज का सम्मान करेगा? या फिर खनन समर्थक दबावों के आगे झुककर ग्रामीणों के हितों की अनदेखी करेगा?
इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि छुईखदान क्षेत्र के 55 गांवों की यह एकजुटता इतिहास में दर्ज होने जा रही है, और खनन के खिलाफ यह आंदोलन अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।
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ग्रामीणों का मानना है कि खनन शुरू होते ही सबसे पहले कृषि भूमि, भूमिगत जल, नदियां-नाले और जंगल प्रभावित होंगे। इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी की आजीविका पर संकट आएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी अंधकारमय हो जाएगा।
इसी चिंता ने 55 गांवों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां अब संघर्ष केवल विरोध तक सीमित नहीं, बल्कि अपने अधिकारों की निर्णायक लड़ाई बन चुका है।
खनन से प्रभावित 55 गांवों की अभूतपूर्व एकजुटता
इस आंदोलन में संडी, पंडरिया, विचारपुर, भरदागोड़, बुंदेली, हनईबन, जगमड़वा, रैमड़वा, मरतकठेरा, सीताडबरी, मैंहर, जोम, उदान, तेंदुभाठा, माणिकचौरी, नवागांव, सुराडबरी, चारभाठा, दनिया, कोटरा, कुकुरमुड़ा, भुरभूसी, खैरी, गोकना, बागुर, पत्थर्रा, बिरनपुर, धोधा, नवापारा, काशीटोला, कालेगोंदी, मंजगांव, गर्रा, जंगलपुर सहित कुल 55 गांव शामिल हैं।
इन गांवों के किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कोई भी गांव अकेला नहीं लड़ेगा, बल्कि पूरा अंचल एकजुट होकर खनन के खिलाफ खड़ा रहेगा।
प्रशासनिक निष्पक्षता संदेह
ग्रामीणों ने जिले के दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि ये अधिकारी निजी कंपनी की प्रेस वार्ता में शामिल होकर कंपनी के पक्ष में बयान दे रहे हैं, जो प्रशासनिक मर्यादाओं के खिलाफ है। ग्रामीणों के अनुसार यह प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग है और इससे किसानों का प्रशासन पर से भरोसा डगमगा रहा है।
दो महीने का संघर्ष, पहली बड़ी जीत
खनन के खिलाफ यह आंदोलन पिछले दो महीनों से लगातार जारी है। 6 दिसंबर को छुईखदान में आयोजित ट्रैक्टर रैली और विशाल विरोध प्रदर्शन ने प्रशासन को हिला कर रख दिया, जिसके बाद 11 दिसंबर को प्रस्तावित श्री सीमेंट की जनसुनवाई रद्द करनी पड़ी। अब गांव में प्रवेश निषेध का फैसला आंदोलन को और अधिक धार देने वाला कदम माना जा रहा है।
ग्रामीणों की एकमात्र मांग
ग्रामीणों की मांग बिल्कुल स्पष्ट और गैर-समझौता योग्य है—
👉 प्रस्तावित चुना पत्थर खनन और श्री सीमेंट फैक्टरी परियोजना को तत्काल और स्थायी रूप से रद्द किया जाए।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया, तो आंदोलन को और व्यापक व उग्र रूप दिया जाएगा।
- लुकेश्वरी जंघेल, अध्यक्ष
- – किसान अधिकार संघर्ष समिति ने कहा,
- “यह लड़ाई केवल खनन के खिलाफ नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। किसान अपनी जमीन, पानी और आजीविका बचाने के लिए पूरी मजबूती से खड़े हैं।”
- गिरवर जंघेल, संरक्षक
- – किसान अधिकार संघर्ष समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
- “हम अपने गांवों की मिट्टी और पानी की रक्षा कर रहे हैं। हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे, इसलिए खनन का विरोध कर रहे हैं। यह संघर्ष अब पीछे नहीं हटेगा।”
सामाजिक संगठनों का मजबूत साथ
इस जनआंदोलन को जिला साहू समाज, जिला लोधी समाज, जिला कोसरिया यादव महासभा, 24 जाति ओबीसी महासंघ (खैरागढ़–छुईखदान–गंडई) सहित कई सामाजिक संगठनों का खुला समर्थन मिल रहा है।
इस सामाजिक एकजुटता ने दनिया–अतरिया–उदयपुर–हनईबन परिक्षेत्र के किसानों में नया आत्मविश्वास भर दिया है।
अब नजर प्रशासन के फैसले पर
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या जिला प्रशासन 55 गांवों की एकजुट आवाज का सम्मान करेगा? या फिर खनन समर्थक दबावों के आगे झुककर ग्रामीणों के हितों की अनदेखी करेगा?
इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि छुईखदान क्षेत्र के 55 गांवों की यह एकजुटता इतिहास में दर्ज होने जा रही है, और खनन के खिलाफ यह आंदोलन अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि जनआंदोलन का स्वरूप ले चुका है।


